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तर्कोऽप्रतिष्ठः श्रुतयो विभिन्ना, नासावृषिर्यस्यमतं न भिन्नम् ।

धर्मस्य तत्त्वं निहितं गुहायां, महाजनो येन गतः स पन्थाः ॥

(महाभारत, वन पर्व ३/१३/११७)

तर्कोऽप्रतिष्ठः श्रुतयो विभिन्ना, नासावृषिर्यस्यमतं न भिन्नम् ।

धर्मस्य तत्त्वं निहितं गुहायां, महाजनो येन गतः स पन्थाः ॥

(महाभारत, वन पर्व ३/१३/११७)

न श्रुतियों में मतैक्य है, न स्मृतियों में ही ।

मुनियों के मत में भी ऐक्य कहाँ?

धर्म का तत्व तो गुहा में ही छिपा हुआ है ।

तब कैसे ढूँढ़ें? कहाँ जाएं? क्या करें?

व्यथित होने की आवश्यकता नहीं, ये महापुरुष जिस मार्ग का सृजन करते हुए गये हैं, न स्खलेन्न पतेदिह – आरूढ़ हो जाओ उस मार्ग पर, जहाँ न स्खलन का भय है, न पतन का ही फिर हम जैसे भ्रांत परिश्रान्त पथिकों के लिए इन महापुरुषों का देदीप्यमान जीवन-चरित्र ही तो निर्भ्रान्त पथ-प्रदर्शक है ।

धन्य तो है इस वसुन्धरा का पवित्र अंचल जो सदा से सन्त परम्परा से विभूषित होता रहा है ।

महाकवि भवभूति की भविष्य वाणी –

‘उत्पत्स्यते तु मम कोऽपि समानधर्मा ।

कालो ह्ययं निरवधिर्विपुला च पृथ्वी ॥’

ऐसी पावन परम्परा में, संसार प्रवास की स्वल्पावधि में विपुल लोकोपकार करने वाले इन महापुरुष का अवतरण भी किसी विशेष उद्देश्य की पूर्ति हेतु ही हुआ है ।

 

तर्कोऽप्रतिष्ठः श्रुतयो विभिन्ना, नासावृषिर्यस्यमतं न भिन्नम् । धर्मस्य तत्त्वं निहितं गुहायां, महाजनो येन गतः स पन्थाः ॥

'उत्पत्स्यते तु मम कोऽपि समानधर्मा ।

कालो ह्ययं निरवधिर्विपुला च पृथ्वी ॥'